क्या आर्यन भारत के मूलनिवासी नहीं है ?

भारत के मूलनिवासी

आखिर कोन है भारत का मूल निवासी??

ये बहस लम्बे समय से चलती आ रही है विशेषतः दक्षिण भारतीय द्रविड़ समुदायों एवं उत्तर भारतीय आर्यनों में ।

परन्तु हालिया खोज से इसका उत्तर मिलता हुआ दिखता है ।

हरियाणा के राखीगढ़ी से 4,500 BC पुराने कंकाल की DNA REPORT , हमारे कुछ सवालों के जवाब हो सकते हैं, जिन्होंने इतिहास और विज्ञान के कुछ बेहतरीन दिमागों को झकझोर दिया है – और बहुत सारी भ्रांतियों को भी जिसे सदियों से सत्य माना जा रहा था जैसे ।

कुछ सवालों के उत्तर तो इस DNA report से मिलें हैं ।

जो इस प्रकार हैं

Q : हड़प्पा सभ्यता के लोग वैदिक हिंदू धर्म की संस्कृत भाषा और संस्कृति के मूल स्रोत थे?

A: नहीं।

Q : क्या भारत की वर्तमान जनसंख्या में उनके जीन एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में जीवित हैं?

A : सबसे निश्चित रूप से।

Q : क्या वे ‘आर्यों’ या ‘द्रविड़ों’ की लोकप्रिय धारणाओं के करीब थे?

A: द्रविड़ियन।

उपरोक्त खुलासे 2015 में पुणे के डेक्कन कॉलेज के एक पुरातत्वविद् और कुलपति डॉ। वसंत शिंदे के नेतृत्व में एक टीम द्वारा किए गए उत्खनन के लंबे समय से प्रतीक्षित और बहुप्रतीक्षित परिणामों का हिस्सा हैं।

क्या भारतीय इतिहास का गलत अनुमान लगाया गया है?

हरियाणा के हिसार में स्थित रखीगढ़ी में सन 1963 में सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेष का पता चला. यहां 1998 से 2001 के बीच खुदाई हुई, जिसमें मोहन जोदाड़ो से भी बड़ा शहर तथा कब्रिस्तान मिला. 2015 में टीला 05 की खुदाई में 4500 साल पुराना कंकाल मिला, उसके DNA में द्रविड़ के जीन पाए गए. किन्तु ज्ञात हो कि भारत का इतिहास विश्व का सबसे विकृत साहित्य है, क्योंकि इसे लिखने वाले इतिहासकर आरंभ से ही राजनिति का शिकार हुए हैं. इन्होंने हरे हुए राजा को महान बताया, कर्म को निम्न और वर्ण को श्रेष्ठ बताया. जबकि भारत में वर्ण व्यवस्था ही नहीं था, बल्कि कर्म प्रधान था.

अब, राजनिति का भगवाकारण हो चुका है, इसलिए इतिहास को भगवा रंग में रंगने की कोशिश किया जा रहा है.

आरंभ में शोधकर्ताओं ने स्पष्ट कहा था कि आर्य भारत के मुलनिवासी नहीं थे बल्कि ये केन्द्र एशिया से भारत में प्रवास किया.

किन्तु वर्तमान भगवाधारी शोधकर्ता प्रमाणित करने में तुले हुए हैं कि आर्य भारत के मुल लोग हैं

और भारत से ही ये केन्द्र एशिया को गए. क्योंकि राखीगढ़ी के टिला 05 की खुदाई में मिले 4500 वर्ष पुराने कंकाल में आर्य और द्रविड़ के मिश्रित जीन पाए गए हैं.

जबकि The Lalantop की सौरभ दिवेदी, India Today के मैनेजिंग एडिटर काय फ़रीजे और The Hindu के टोनी जोसेफ़ के रिपोर्टिंग के अनुसार आर्य भारत के मुलनिवासी नहीं थे.

क्योंकि रखीगढ़ी में मिले कंकाल के DNA में R1a1 जीन नहीं पाये गए हैं जो आर्य के जीन है. वही दयाल सिंह कॉलेज के प्रो0 हेमंत मिश्रा और Delhi Universcity के इतिहास के प्रो0 नरोत्तम नवीन ने भी भाषा लिपि और सभ्यता के आधार पर आर्य को भारत के मुलनिवासी होने से इंकार किया है.

सिन्धुघाटी सभ्यताऔर वैदिक_सभ्यता :

सिन्धु घाटी सभ्यता और वैदिक सभ्यता अलग-अलग सभ्यता थी क्योंकि सिन्धु घाटी सभ्यता एक शहरी सभ्यता थी जबकी वैदिक सभ्यता ग्रमीण सभ्यता थी. सिन्धु घाटी सभ्यता 2500 ई0 पुर्व की थी जबकि वैदिक सभ्यता 1500 ई0 पुर्व की सभ्यता थी.

जब यह भारत में प्रवास किया तो सिन्धु सभ्यता का पतन हो चुका था.

सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग संस्कृत और हिन्दु संस्कृति के स्त्रोत नहीं थे क्योंकि यहां पर न मंदिर और न मुर्ति पुजा करने के अवशेष मिले हैं.

सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग बैल को पुज्यनीय मानते थे. गाय को दुध, बच्छड़ा और मांस के लिए पालते थे.

सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग शव को दफ़नाते थे जबकि वैदिक सभ्यता के लोग जलाते या जल में प्रवहित करते थे.

सिन्धु घाटी सभ्यता के लोग द्रविड़ के ज्यादा करीब थे क्योंकि वे दक्षिण भारतीयों से ज्यादा मिलते थे. अर्थात सिन्धु घाटी सभ्यता और वैदिक सभ्यता एक नहीं था, न आर्य भारत के मुलनिवासी थे.

सनातन धर्म और हिन्दु देवी देवता भारत में नये थे।

इसका परिमाण इस बात से भी मिलता है कि 4500 बीसी पूर्व के जो शव मिलें है, वो मिट्टी में दबे मिले हैं।

जबकि आर्य और वैदिक सभ्यता में शवों को जलाने का या जल में बहाने का प्रावधान था।

सिंधु घाटी के लोगों के पास आज भी कई उत्तर भारतीय उच्च जातियों में निशान और वंशावली का अभाव है ।


पुरातत्वविद इस तथ्य का जिक्र कर रहे थे कि हड़प्पा सभ्यता से संबंधित किसी भी शोध को भारत सरकार के हिंदुत्व के एजेंडे का सामना करना होगा – जिसकी राजनीति वैदिक हिंदू धर्म के मूल के रूप में वैदिक हिंदू धर्म की उत्पत्ति की मांग करती है।

इतिहासकारों या हड़प्पा या सिंधु घाटी सभ्यता पर काम करने वाले किसी व्यक्ति के लिए, यह एक जटिलता है।

वास्तव में, जब 1920 के दशक में सिंधु घाटी सभ्यता का पहली बार पता चला था, तो औपनिवेशिक पुरातत्वविदों ने इसकी पहचान पूर्व-वैदिक संस्कृति के साक्ष्य के रूप में की थी

जिसे उन्होंने सैद्धांतिक रूप से उत्तर-पश्चिम के ‘आर्यन’ आक्रमणकारियों के आगमन से पूरी तरह नष्ट कर दिया था। जिन्होंने हिन्दू भारत की सुबह का प्रतिनिधित्व किया।

बाद के वर्षों में, अधिकांश मुख्यधारा के इतिहासकारों ने ‘आर्यन आक्रमण सिद्धांत’ या ‘एआईटी’ को ओवरसिम्प्लीफिकेशन के रूप में त्याग दिया है – जबकि एक कालक्रम को बनाए रखा है जो वैदिक सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता के उत्तराधिकारी के रूप में रखता है।

और आर्यन आक्रमण सिद्धांत हिंदुत्व के राष्ट्रवादियों को रैंक करना जारी रखता है, क्योंकि इसने दक्षिण भारत में एक लोकप्रिय राजनीति के मूल कथा के रूप में जड़ें जमा ली हैं,

जो सिंधु घाटी सभ्यता को द्रविड़ संस्कृति के रूप में देखता है जो विंध्य के दक्षिण में केवल ‘ब्राह्मणवादी’ आक्रमणकारियों से बच गया है।

अगर ‘भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन ’शिक्षाविद के हिंदुत्व के मोर्चे पर आगे बढ़ रहा था, तो विज्ञान लगातार दूसरी दिशा में आगे बढ़ रहा था।

यह महत्वपूर्ण है क्योंकि R1a1, जिसे अक्सर ‘आर्यन जीन’ कहा जाता है, अब यह समझा जाता है कि कांस्य युग के चरागाहों की आबादी में उत्पन्न हुआ था।

जो आज लगभग हर उत्तर भारतीय में पाया जाता है ।

क्या आर्यनों ने मूल-निवासियों को गुलाम बनाया??

भारत में एक पक्ष ऐसा भी है, जो यह मानता है कि वैदिक सभ्यता ने जानबूझकर वर्ण व्यवस्था की स्थापना की तथा भारत के मूल निवासीयों को निचली जातियों में रखा ।

व खुद को ऊँची जातियों में ताकि वे हमेशा भारत के मूल निवासीयों का शोषण कर सकें ।

इसके पक्ष में वे यह भी तर्क देतें हैं की वर्ण व्यवस्था जैसी अमानवीय व्यवस्था जिसमें कोई जन्म से ही अछूत हो जाता है, कोई जन्म से ही विद्वान हो जाता है, और कोई योद्धा ।

केवल और केवल हमेशा मूल-निवासियों को गुलाम बना के रखने का साधन है ।

परन्तु सच क्या है इसके लिए और गहन अध्ययन की जरूरत है ।

आप क्या समझते हैं comments box में बतायें ।