TEXTILES SECTOR में भी मंदी की मार ,इसका आम आदमी पर असर

टेक्टाइल्स सेक्टर की स्थिति

ओटो और बैंकिंग सेक्टर के बाद अब टेक्टाइल्स सेक्टर में मंदी का असर दिखने लगा है । यंहा लगभग एक तिहाई मिलें बंद हो गयी हैं तथा जो चल भी रहीं हैं उनमें अधिकतर घाटे में चल रही है ।

नौकरियां लगातार जा रही है,और जैसे हालात हैं अभी और जायेंगी ।

शायद इतिहास में पहली बार हुआ होगा कि अखबार में नोकरी देने का नहीं नोकरी से निकालने का विज्ञापन छपा है ।

अगर आप सोच रहे हैं कि इनकी नौकरियां जाने से हमें क्या तो आप गलतफहमी में जी रहें हैं ।

क्योंकि अगर एसे ही लगातार हर इन्डस्ट्री डूबती जायेगी तो उसके निम्नलिखित प्रभाव हमारे-आपके जीवन पर पडेगें।

कल्याणकारी कार्यों के खर्चों में कटौती

कल्याणकारी कार्यों में होने वालें खर्चो में कमी करनी पड़ेगी अर्थात स्कूल कॉलेजेस हॉस्पिटल आदि के खर्चो में कमी होगी। गरीबों की हालत और दयनीय हो जाएगी। 

विकास कार्यों में धीमापन


विकास कार्यों में धीमापन जब कमाई ही कम होगी तो इन्वेस्टमेंट भी कम होगी अतः विकास कार्यों में बहुत धीमापन आ जायेगा। 

क्राइम में वृद्धि



क्राइम रेट भी बढ़ने की संभावना है और अगर हम और आप सोच रहें हैं की हमारा बिज़नेस या जॉब तो सिक्योर है हमें क्या मतलब पर जरा सोचिये अगर समाज में क्राइम रेट बढ़ेगा तो उसका शिकार कोन होगा हम और आप ही न।

बेरोजगारी भी बढ़ेगी क्योंकि जब उधोगों को हानि होगी तो वो लागत कम करने के लिए खर्चों में कमी करेगी परिणाम स्वरुप कर्मचारियों की छटनी होगी तथा बेरोजगारी लगातार बढ़ती ही जाएगी।

भारतीय मुद्रा का ह्रास



भारतीय मुद्रा का ह्रास होगा तथा विश्व में भारत की शाख गिरेगी और भारत की इन्फ्लुएंसिंग पावर भी कम हो जाएगी जिसका फायदा प्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान और चीन को मिलेगा। 

आइये अब सत कताई क्षेत्र की वर्तमान स्थिति के बारे में जानने का प्रयास करते हैं ।

भारतीय सूत कताई क्षेत्र काफी तनाव में है और पिछले एक दशक में उद्योग के प्रतिनिधित्व वाले शीर्ष निकाय के अनुसार संकट का सामना नहीं कर रहा है। नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल मिल्स एसोसिएशन (NITMA) ने कहा है कि कपड़ा उद्योग मंदी का सामना कर रहा है, जिसने कताई कंपनियों को अपने उत्पादन में कटौती करने और अपनी मिलों को बंद करने के लिए मजबूर कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी नौकरी का नुकसान हुआ है।

उद्योग निकाय के अनुसार, देश में अतिरिक्त कताई क्षमता और विदेशी बाजारों से यार्न की खराब मांग के कारण उद्योग में यार्न के स्टॉक और तरलता का संकट पैदा हो गया है।

उद्योग निकाय ने दावा किया कि यार्न निर्यात, सस्ता आयात, निर्यात पर राज्य और केंद्रीय स्तर के करों में तेज गिरावट और उच्च ब्याज दरों के कारण भारत का कपास-कताई उद्योग वर्षों से लाभप्रदता से जूझ रहा है। संकटों के कारण, कपास की कीमतों में हालिया तेजी से देश में कताई क्षेत्र के लिए उच्च इनपुट लागत के परिणामस्वरूप वित्तीय तनाव पैदा हो गया है।

NITMA के अनुसार, पिछले 9 वर्षों में कपास और मिश्रित कताई उद्योग में सबसे बड़ा संकट देखा जा रहा है।

पिछले कुछ महीनों में सूती धागे के निर्यात में भारी गिरावट से कपड़ा उद्योग प्रभावित हुआ था।

इस वित्त वर्ष की अप्रैल-जून अवधि के दौरान, सूती धागे का निर्यात पिछले वर्ष की समान अवधि में $ 1,063 मिलियन की तुलना में 34.6% घटकर $ 696 मिलियन हो गया।

कपड़ा उद्योग में मंदी, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगभग 10 करोड़ लोगों को रोजगार प्रदान करती है और जीडीपी के 2% के लिए जिम्मेदार है,

भारी घाटे के कारण जिनिंग फैक्ट्रियों, कताई मिलों और हथकरघा इकाइयों को बंद कर दिया है। उद्योग ने नौकरी के नुकसान को रोकने और कताई क्षेत्र को गैर-प्रदर्शन परिसंपत्तियों (एनपीए) में बदलने से बचने के लिए सरकारी हस्तक्षेप की मांग की है।

अर्थात अगर कताई क्षेत्र डूबा तो साथ-साथ पहले से खस्ताहाल चल रहे बैंकिंग सेक्टर को और धक्का लगेगा ।

एनआईटीएमए ने कहा कि कपड़ा कताई मिलों ने अपने उत्पादन में कटौती की है, जिसके परिणामस्वरूप भारत में लगभग एक तिहाई कताई क्षमता बंद हो गई है। मिलों को भारी नुकसान हो रहा है और भारतीय कपास खरीदने और उपभोग करने की स्थिति में नहीं हैं।

एसोसिएशन ने चेतावनी दी कि लगभग 40 मिलियन गांठों की कपास की आगामी फसल, जिसकी कीमत 80,000 करोड़ रुपये है, घरेलू और विदेशी बाजार में खरीदार नहीं मिलेगा क्योंकि भारतीय बाजार में बाजार संचालित नहीं था क्योंकि सरकार सीधे किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ समर्थन करती है ( MSP) स्तर।

यहाँ कुछ मुद्दे हैं जो भारतीय कपास-कताई क्षेत्र को वापस पकड़ रहे हैं:

उच्च कर: उद्योग निकाय ने आरोप लगाया कि हर मूल्यवर्धन पर बहु-स्तरीय कर लगाया जाता है। राज्य और केंद्रीय करों, प्लस लेवी के परिणामस्वरूप भारतीय धागे वैश्विक बाजारों में गैर-प्रतिस्पर्धी बन रहे हैं।
कच्चे माल की उच्च लागत: अपने वैश्विक प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में, भारतीय कताई मिलों को कच्चे माल पर अधिक खर्च करना

पड़ता है, जो सीधे उत्पादन की अपनी लागत को प्रभावित करता है, और इसलिए वैश्विक बाजार में देश की प्रतिस्पर्धा। कच्चे माल की कीमत वैश्विक कीमतों की तुलना में बहुत अधिक है, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय मिलों को 20-25 रुपये प्रति किलोग्राम का नुकसान होता है।
सस्ता आयात: बांग्लादेश, श्रीलंका और इंडोनेशिया के कपड़ों और धागों के सस्ते आयात से सूत कताई का उद्योग प्रभावित हुआ है। इसका कारण भारत की तुलना में उनके कच्चे माल की कम लागत है।