CURRENT SITUATION OF INDIAN ECONOMY

OVERALL VIEW OF INDIAN ECONOMY

भारत की अर्थव्यवस्था एक विकसित मिश्रित अर्थव्यवस्था है। यह जीडीपी की दृष्टि से दुनिया की सातवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और क्रय शक्ति समानता (पीपीपी) द्वारा तीसरा सबसे बड़ा है। 2018 तक देश में प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में 139 वां और प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (पीपीपी) में 119 वां स्थान है।1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद, भारत ने सालाना औसतन 6-7% जीडीपी वृद्धि हासिल की है ।भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी तेजी धीरे-धीरे खो रही है. अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र मांग की कमी से प्रभावित है. आरबीआई ने भी अपनी मौद्रिक समिति की बैठक में भारतीय अर्थव्यवस्था के जीडीपी ग्रोथ रेट के पूर्वानुमान को घटाकर 6.9% कर दिया है. भारतीय अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों के आंकड़ों पर गौर करें तो निष्कर्ष निकल रहा है कि वह धीरे-धीरे मंदी की तरफ बढ़ रही है.
एक दौर में प्रभावशाली निजी विमान सेवा कंपनी जेट एयरवेज आज बंद हो चुकी है. एयर इंडिया बड़े घाटे में चल रही है. किसी दौर में टेलीकॉम सेक्टर की पहचान रही बीएसएनल आज अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है.
रक्षा के क्षेत्र में सरकारी कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स ने हाल ही में बाजार से 1000 करोड़ रुपये का कर्ज अपने कर्मचारियों को वेतन भुगतान के लिए लिया है. यह इस दशक में पहली बार था. भारतीय डाक सेवा का वित्त वर्ष 2019 में वार्षिक घाटा ₹15000 करोड़ हो चुका है.
वर्तमान में यह सबसे बड़ी नुकसान वाली सरकारी कंपनी बन चुकी है. भारत की सबसे बड़ी कच्चे तेल और नेचुरल गैस की कंपनी ओएनजीसी का अतिरिक्त कैश रिजर्व तेजी से घट रहा है. सरकार द्वारा गैर-जरूरी अधिग्रहण के चलते आज यह कंपनी एक बड़े कर्ज के दबाव में आ गई है.परन्तु अब भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी नजर नहीं आ रही इसके कुछ प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं ।

Automobiles industry

ऑटोमोबाइल बाजार वश में है और बाजार की भावनाएं उनके सबसे नकारात्मक नादिरों पर हैं। पिछले दशकों के अभूतपूर्व विकास के वर्षों (2008-09 की मंदी के दौरान) कुछ विरल प्रतीत होते हैं, जो भारत के रियर व्यू मिरर पर दिखाई देते हैं। अभिलेखों के अनुसार, हाल के इतिहास में सबसे तेज गिरावट नवंबर 2008 @ 24.6% में दर्ज की गई थी, जब वैश्विक मंदी तब चरम पर थी। अन्य महत्वपूर्ण गिरावट अक्टूबर 2011 के दौरान थी, जब 21.1% की गिरावट थी और फरवरी 2003 के दौरान, गिरावट 19.9% थी।जुलाई 2019 के बाद से यात्री वाहनों की बिक्री 31% और यहां तक कि मारुति (एमएसआईएल), बाजार के नेता और दशकों से विकास संकेतक, 2018 में एक ही महीने में 36.7% बिक्री के नुकसान का सामना करना पड़ा है, जुलाई 2019 में उनका उत्पादन कुल 96,478 इकाइयाँ। लेकिन मारुति के अध्यक्ष का कहना है कि एफएमसीजी और कुछ अन्य क्षेत्रों ने पिछली तिमाही के दौरान विकास दिखाया है और ऑटोमोबाइल बाजार में लंबे समय से कमजोर मांग के सटीक कारण की पहचान की जानी चाहिए।ऑटोमोबाइल डीलर दुकानें बंद कर रहे हैं और उनमें से लगभग 100 ने पूरे भारत में ऐसा किया है। इसके अलावा, प्रमुख वाहन निर्माता उत्पादन पर धीमी गति से चल रहे हैं क्योंकि इन्वेंट्रीज़ ढेर हो गए हैं और बीएस VI, डी-डे लगभग 8 महीने दूर है। आने वाले दिनों में ऑटो-मेकर्स और ऑटो-डीलरों द्वारा बड़े पैमाने पर छंटनी की जाएगी

गंभीर समस्याओं से जूझ रही अर्थव्यवस्था

भारतीय बैंकिंग व्यवस्था अभी एनपीए की त्रासदी को झेल रही है. वर्तमान में कुल एनपीए 9,49,279 करोड़ रुपये का है. एनपीए का 50% हिस्सा तो महज देश के 150 बड़े पूंजीपतियों की वजह से हुआ है.
हां, यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही होगा कि पिछले 4 सालों 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक के एनपीए में कमी आई है. लेकिन, यह भी याद रखना होगा कि पिछले 5 सालों में मोदी सरकार ने बड़े पूंजीपतियों के ₹5,55,603 करोड़ के लोन माफ कर दिए हैं.

Exports industry कि आर्थिक स्थिति

Q3 FY2019 में भारत का परिधान निर्यात औसत तिमाही निर्यात से कम रहा। कहा जाता है कि, आईसीआरए ने उम्मीद की है कि आंतरिक चुनौतियों और अचानक दबावों से निपटने के लिए रिकवरी में कमी आएगी और रिकवरी होगी, हालांकि रिकवरी की गति चुनौतीपूर्ण वातावरण को देखते हुए मौन रहने की संभावना है।बचत की दर में गिरावटघरेलू निवेश की बुनियाद हाउसहोल्ड सेविंग पर टिकी होती है. वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था में हाउसहोल्ड सेविंग में गिरावट दर्ज की गई है. वर्ष 2011-12 में हाउसहोल्ड सेविंग की दर 68.2% थी. पर, 2017-18 में यह घटकर 56.3% रह गई.
2017 में आम लोगों की कुल बचत दर जीडीपी के अनुपात में घटकर 17% पर आ गई जो पिछले 20 सालों में सबसे कम है. कृषि विकास दर भी ऐतिहासिक गिरावट के साथ 2.9% की दर से आगे बढ़ रही है. वर्तमान कृषि विकास दर पर किसानों की दोगुनी आय का सपना 2022 तक किसी भी कीमत पर नहीं पूरा हो सकता है. इसके लिए प्रति वर्ष 9%-10% की दर की जरूरत पड़ेगी.

नोटबंदी का असर

नोटबंदी के बाद सारा पैसा बैंकों में आ गया था,परन्तु उधोग धन्धे भी cash crisis के चलते फल फूल नहीं पाये तथा अनिश्चित भविष्य के कारण अधिक ऋण की मांग नहीं की जो कि उस समय उन्हें आसानी से उपलब्ध भी हो जाता ।तब बैंकों ने NON BANKING FINANCE SECTOR जैसे IL & FS (Infrastructure Leasing & Finance Services),DHFL(Dewan Housing Finance Corporation), आदि को अधिक ऋण दिया परन्तु अब ये कंपनियां घाटे में जा रही हैं!तथा ये अपना ऋण वापिस नहीं लोटा पा रहीं हैं, इस कारण बैंकों का NPA(Non performing assets) लगातार बढता जा रहा है ।

कैपिटल एक्सपेंडिचर में कमी

भारत में पहले ही धीमी विकास दर के साथ-साथ नौकरियों की किल्लत है। लेकिन, जिस रास्ते अर्थव्यवस्था आगे बढ़ रही है उसमें नौकरियों का हाल और भी बुरा होने वाला है। द टेलिग्राफ के मुताबिक GFCF (Gross fixed Capital Formation) में लगातार गिरावट, जीएसटी से उम्मीद के मुताबिक टैक्स का नहीं मिलना और कैपिटल एक्सपेंडिचर में कमी आने का खामियाजा अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ सकता है। 2019 में पीयूष गोयल ने अंतरिम बजट पेश करते हुए दावा किया था कि 2022 तक हम न्यू इंडिया बनाएंगे और इस दौरान किसानों की आयो दोगुनी होगी तथा नौजवानों को बेहतर अवसर मिलेंगे। लेकिन, वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि GFCF में गिरावट के चलते जीडीपी की वर्तमान दशा दर्शाती है कि देश में निवेश कम पैमाने पर हुआ है। इसका मतलब युवाओं के लिए नौकरियों के अवसर भी कम तैयार हुए हैं।अर्थव्यवस्था को दूसरी सबसे बड़ी चोट टैक्स कलेक्शन के मामले में है। जितना टैक्स कलेक्शन का अनुमान सरकार ने लगाया था, उससे कम की आपूर्ति हो पाई है। 2018-19 में 14,84,406 करोड़ रुपये तय हुआ था। लेकिन, वास्तिक रूप में यह 13,16,951 रहा। इसका मतलब है कि 1,67,455 करोड़ की टैक्स कलेक्शन में कमी रह गई। इसका मतलब साफ था कि जीएसटी से जिस मद में टैक्स कलेक्शन की अंदाजा लगाया जा रहा था वह नहीं हो पाया। जबकि, 2019 में अंतरिम बजट पेश करते हुए गोयल ने कहा था कि जीएसटी के लागू होने से टैक्स कलेक्शन दायरा बढ़ेगा और इसमें इजाफा भी होगा।इसके अलावा सरकार ने तय लक्ष्य से 145,813 करोड़ रुपये कम खर्च किए। जबकि, पीयूष गोयल ने अंतरिम बजट के दौरान इंफ्रास्ट्रक्चर डिवलपमेंट पर विशेष तवज्जो देने की बात कही थी।

अब क्या करना चाहिए

भारत में आई इस मंदी से बचने के उपाय मेरे विचार से ये निम्नलिखित हो सकते हैं ।

सार्वजनिक खर्चों में वृद्धि

सरकार को इस समय अपने सार्वजनिक व्ययों में वृद्धि करनी चाहिए ताकि आम जनता के हाथ में कुछ धन आये तथा वे बाजार में खर्च कर सकें,व उत्पादक अधिक उत्पादन करने के लिए प्रेरित हो ।

सरकारी खर्चों में कटौती

अर्थात उन खर्चों में कटौती करना जो Non productive हों जैसे वि आई पी कल्चर पर होने वाले खर्च, नेताओं के अत्याधिक विदेशी दोरे।

टैक्स रिफॉर्म

टैक्स कैलकशन काफी कम हो गया है GST को और सरल बनाने की आवश्यकता है ।

निवेशकों में भरोसा उतपन्न करना

देशी तथा विदेशी निवेशकों में भरोसा उतपन्न करना चाहिए ताकि वे भारत में निवेश करने में हिचके नहीं ।

एक्सपोर्ट बढाना आदि ।

परन्तु सच्चाई ये है अगर सारे जरूरी कदम आज ही उठा लिए जायें फिर भी उसका नतीजा आने में कम से कम 6 माह तो लग ही जायेंगे, तब तक न जाने कितने ही उधोग बंद हो चुके होंगे और न जाने कितने ही अपनी नौकरियां गंवा चुके होंगे ।