जातिवाद का अंत कब??

हम 21वीं सदी में जी रहें हैं ।परन्तु कुछ लोगों की सोच अब भी बहुत नीची है ।
इसका ताजा उदाहरण वेल्लोर में मिलता है जहाँ

एक 46 वर्षीय दलित व्यक्ति के मृत शरीर को नदी के ऊपर 20 फीट ऊंचे पुल से नीचे उतारा गया ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि तमिलनाडु के वानीयंबादी में उच्च जाति के हिंदुओं के खेतों से उस दलित व्यक्ति का शव न गुजरे so called उँची जाति के लोगों ने वेल्लोर जिले में उन्होंने शव को अपनी जमीन के माध्यम से ले जाने की अनुमति नहीं दी।

क्यों समाज में ऐसे सोच के लोग मौजूद हैं? जो ऐसी सोच रखते हैं की एक व्यक्ति के शव यात्रा से भी उनकी जमीन दूषित हो जायेगी ।

दरअसल मेरे विचार में सब जानते हैं कि ऐसे जमीन दूषित नहीं होती even वो उँची जाति वाले भी पर

सदियों से जो luxury वो उँची जाति में पैदा होने के कारण उठा रहे हैं,उसे खोना नहीं चाहते,तभी वे ऐसा कोई मोका नहीं छोड़ते जिससे वे खुद को श्रेष्ट व दूसरों को नीचा साबित कर सकें ।

और इन्हीं जातियों ने अपने ढाल के रुप में आरक्षण की स्थिति को खड़ा कर रखा है जबकी आरक्षण तो केवल सरकारी नौकरियों में ही हैं ।

Deatails information के लिये इस link पर click करें ।

https://indianeconomycurrentsituation.com/2019/08/current-situation-of-reservation-in-india.html

वास्तव में problem merit की न होकर अपने बराबर में उनको स्वीकार करने से है।

कयोंकि अगर केवल merit की बात होती तो managenent quota हटाने के लिये भी कोई बोलता ।

इस पर भी बहस होनी चाहिए ।

आईये अब इस घटना से आपको अवगत कराते हैं ।

शव यात्रा का वायरल वीडियो से घटना संज्ञान में आयी।

यह घटना 17 अगस्त को हुई थी, लेकिन यह बुधवार को सामने आया जब एक वीडियो वायरल होने के बाद, थिममपेट्टई पुलिस स्टेशन में पुलिसकर्मियों ने कहा।

3.46 मिनट के लंबे वीडियो में, दलितों के एक समूह को पुल से शव को निचे उतारते हुए देखा जाता है। एक अन्य समूह, पुल के अलावा श्मशान घाट के पास खड़ा है और वे शव को उठाते हैं ।

श्मशान में पहुंच से इनकार, तमिलनाडु में दलित के शव को पुल से लटकाया

एन कुप्पन नामक दलित शख्स का शनिवार को निधन हो गया था। उनके पार्थिव शरीर को एक पुराने अंतिम संस्कार के मैदान में ले जाया जाना था, लेकिन वहां जाने के लिए कुछ उच्च जाति के स्थानीय लोगों की कृषि भूमि से होकर गुजरना था, लेकिन उन्होंने शव यात्रा को प्रवेश देने से इनकार कर दिया। तो फिर क्या था दर्जन भर लोगों ने धीरे-धीरे पुल से स्ट्रेचर को नीचे उतारा। इसका वीडिया भी वायरल हो गया और उसमें साफ देखा जा सकता है कि कितने खतरे से खेलते हुए ऐसे शव को उतारा जा रहा है। इस दौरान शव से मालाएं भी गिरती देखी गईं।

तमिलनाडु के वेल्लोर जिले के वानीयंबादी तालुक में सामने आई यह घटना इस बात का प्रतिनिधित्व करती है कि गाँव में स्थानीय उच्च जाति के समुदाय के सदस्यों द्वारा दलितों के साथ किस तरह से भेदभाव किया जाता है; दलित समुदाय के पास खुद का एक श्मशान भी नहीं है।

हालांकि, यह पहली बार नहीं है कि इस तरह की घटना हुई है, समुदाय के अनुसार जिसने जोड़ा कि उन्हें अतीत में समान भेदभाव का सामना करना पड़ा है।

उनमें से कुछ ने तो यहां तक कहा कि शवों का अंतिम संस्कार करने का यही एकमात्र तरीका है और कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं है।

क्षेत्र के सरकारी अधिकारियों ने कहा कि इस तरह की घटना हुई है या नहीं, यह पता लगाने के लिए जांच की जाएगी कि जो भी दोषी पाया जाएगा उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।