PAYAL TADVI SUICIDE

PAYAL TADVI SUICIDE CASE

Article 15 हमें समता का अधिकार देता है,अर्थात हर भारत वासी समान है चाहे व किसी भी जाती,वर्ण,धर्म या लिंग का हो पर क्या वास्तव मेंं सब समान हैं?

नहीं है आज भी भेदभाव समाज में मोजूद है इसका ताजा उदाहरण आपके सामनेे महानगर मुम्बई में मिला है।

पायल तड़वी जो SECOND YEAR PG की छात्रा थी B.Y.L. हॉस्पिटल मुंबई की अपने आदिवासी समाज की पहली डॉक्टर होती अगर आज वो जिन्दा होती ,उन्होंने अपने हॉस्टल रूम में 22 मई 2019 को सुसाइड कर ली।
इनकी सुसाइड का जो कारण बतलाया जा रहा है वो है तीन सीनियर डॉक्टर द्वारा उनकी रैगिंग करना और बार बार उनको आदिवासी और अन्य जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करना जिससे तंग आके उन्होंने ये कदम उठाया।
 पायल तडवी के फेसबुक अकाउंट पर आखिरी सार्वजनिक पोस्ट की, जिसमें उन्होंने मुंबई के एक प्रतिष्ठित निजी अस्पताल में शामिल होने की घोषणा की। पोस्ट में कहा गया है कि उसने TNMC और BYL नायर अस्पताल, मुंबई में एक स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में एक नई नौकरी शुरू की।

वह 13 मई, 2018 को अस्पताल में अपनी नौकरी शुरू की
और 22 मई, 2019 को उसने आत्महत्या कर ली।
एक साल में ऐसा क्या हुआ जिसने 26 साल के एक डॉक्टर को ऐसा कदम उठाने के लिए मजबूर किया? अपने सहयोगियों से बार-बार भेदभाव होता है क्योंकि वह एक आदिवासी  जाति से थी।
पायल ताडवी, एक पोस्ट-ग्रेजुएट मेडिकल छात्रा , जो मुंबई के प्रीमियर नायर अस्पताल में शामिल हुई, ने भारतीय शैक्षिक प्रणाली में कई छात्रों का सामना किया – रैगिंग। लेकिन जो बात उनकी कहानी को अलग बनाती थी, वह थी सामाजिक बहिष्कार जो एक निचली जाति से होने के साथ आया था।
उसकी मौत ने मुंबई को हिला दिया है, एक शहर अन्यथा इसकी उदासीनता की आलोचना करता है। मुंबईकरों ने एक आदिवासी महिला की “संस्थागत हत्या” का विरोध करने के लिए सड़कों पर ले लिया, जिसने अपने समुदाय के सदस्यों पर लगाए गए कांच की छत को तोड़ दिया।
लोगों में भावना कहाँ से आती है की अगर कोई आदिवासी है या निचली जाती का है तो जरूर वो नाकाबिल ही होगा और केवल आरक्षण के बलबूते पर आगे बढ़ा होगा। क्या कोई डाटा या सर्वे हुआ है ऐसा जो ये साबित करता है?

जाती  क़ाबलियत का पैमाना नहीं होना चाहिए लगभग सब इस बात से सहमत नजर आते हैं ,तो क्यों किसी आदिवासी या दलित या obc को किसी जॉब या एजुकेशनल संसथान में दाखिला मिलने पर ऐसे ताने सुनने को मिलते हैं जो पायल को भी मिले।

एक आदिवासी महिला जिसको पढ़ने के लिए ही कितना संघर्ष करना पड़ा होगा ,न अच्छे स्कूल न उचित संसाधन फिर भी वह सबसे लड़ते लड़ते इस मुकाम पर पहुंची थी। जिसका सम्मान होना चाहिए था उसका अपमान हुआ,वो और संघर्ष नहीं कर पायी।

ये भावना समाज में कूट कूट के भर दी गयी है,आजतक किसी ने सुना है paid सीट या मैनेजमेंट सीट पर पैसे दे के एडमिशन प्राप्त किसी छात्र का अपमान या रैगिंग की हो ? नहीं न जरा आप सोचें वो छात्रा कितनी बड़ी उपलब्धि हासिल करती और उसको देख के कितने लोग प्रभावित होते।

पायल के बारे में जाने

पायल तडवी महाराष्ट्र के जलगाँव जिले से हैं। एक भील मुस्लिम, वह अनुसूचित जनजातियों की थी।
उनके पति, सलमान तडवी, आरएन कूपर अस्पताल में एक सहायक चिकित्सा प्रोफेसर हैं और उन्होंने 2016 में शादी की थी

उनकी माता का नाम आबिदा सलीम है। वो महारष्ट्र के जलगांव की रहने वाली थी।

पायल का एक भाई भी है जो शारीरीक रूप से अक्षम है, उसको देख कर ही  पायल ने डॉक्टर बनने  की ठानी थी।

पायल ने अपना mbbs मीरज के मेडिकल कॉलेज से किया था।

13 से मई 2018 में नायर अस्पताल के स्त्री रोग विभाग में चुना गया था। उसके शामिल होने के बाद से उसे रैगिंग से गुजरना पड़ा था और उसके आने का भी मजाक उड़ाया गया था।

FIR में क्या

दूसरे वर्ष की पीजी छात्रा ने अपना जीवन समाप्त करने के बाद दायर की गई प्राथमिकी में कहा है कि उसके वरिष्ठों ने उसे अक्सर धमकी दी थी, यह कहते हुए कि उसे ऑपरेशन थिएटर में नहीं जाने दिया जाएगा या प्रसव कराने की अनुमति नहीं दी जाएगी। एफआईआर के अनुसार उसे व्हाट्सएप ग्रुपों पर आदिवासी होने के लिए भी मजाक बनाया गया था। अबेडा ने दावा किया कि उसकी बेटी ने 22 मई को उसे बुलाया – जब वह उत्तरी महाराष्ट्र के जलगाँव जिले में अपने गृहनगर में थी – और उसे कथित उत्पीड़न के बारे में बताया।
अस्पताल ने अबेदा के आरोपों की जांच के लिए एक आंतरिक जांच समिति बनाई थी कि पायल को उसकी जाति के लिए तीन महिला वरिष्ठों द्वारा परेशान किया जा रहा था और रैगिंग का शिकार भी हुई थी।

पायल के परिवार के सदस्यों का मत

डॉ। तडवी के पति सलमान और मां आबिदा सलीम ने तीन डॉक्टरों के खिलाफ “सख्त कार्रवाई” की मांग की है। सलमान तडवी ने आरोप लगाया कि तीन डॉक्टरों ने उसकी पत्नी को व्हाट्सएप पर अपमानित किया और अपमानित किया क्योंकि वह एक अनुसूचित जनजाति से थी।
सलमान तडवी ने  बताया, “उसे निचली जाति का होने के कारण चुना गया था और उसके वरिष्ठों द्वारा उसे बहुत तंग किया गया था। वरिष्ठों ने कहा कि वे उसका अध्ययन नहीं होने देंगे। वे उसे व्हाट्सएप पर भी अपमानित करते थे।”
समाचार एजेंसी पीटीआई के हवाले से श्री तडवी ने कहा, “हम चाहते हैं कि सरकार हस्तक्षेप करे। पुलिस कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। यह संभव है कि पायल की हत्या तीन महिला डॉक्टरों ने की हो।”
डॉ तडवी की मां अबेदा ने कहा कि उनकी बेटी ने उनसे अपने वरिष्ठों के खिलाफ लिखित शिकायत नहीं देने का अनुरोध किया था क्योंकि इससे उनके करियर पर असर पड़ेगा। पायल, अपनी मां के अनुसार, डॉक्टरों द्वारा “क्षुद्र मुद्दों” पर परेशान किया गया था, जिन्होंने अपने रोगियों के सामने “उन पर फाइलें फेंक दी”।
पायल ने पीटीआई के हवाले से कहा था कि पायल मुझे अपने वरिष्ठों द्वारा उन यातनाओं के बारे में बताती थी जो वह अपने वरिष्ठ नागरिकों के सामने पेश करती थीं। उन्होंने मरीजों के सामने उनके चेहरे पर फाइलें फेंक दीं।

आरोपियों का पक्ष

तीनो आरोपी महिला डॉक्टरों ने एक पत्र में रेजिडेंट डॉक्टरों के एक संघ से पूछा है कि उन्हें “निष्पक्ष जांच” और “न्याय” दिया जाए।
महाराष्ट्र एसोसिएशन ऑफ रेजिडेंट डॉक्टर्स (MARD) को लिखे पत्र में तीन डॉक्टरों ने कहा, “यह हमारा पक्ष सुने बिना पुलिस बल और मीडिया के दबाव में जांच करने का तरीका नहीं है।”
रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन ने तीन डॉक्टरों को निलंबित कर दिया है, पीटीआई की रिपोर्ट में। एसोसिएशन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने पीटीआई को बताया कि उनके पास तीन डॉक्टरों के आरोपों पर विश्वसनीय इनपुट थे और पुलिस के साथ पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया।

सड़कों पर प्रदर्शन

पीड़िता की मां आबिदा तडवी के साथ उनके परिवार के सदस्यों, स्थानीय लोगों और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा गुरुवार को मुंबई में बीवाईएल नायर अस्पताल के बाहर विरोध प्रदर्शन किया गया।

सलमान, स्वर्गीय डॉ। पायल के परिवार के सदस्य ने आरोप लगाया कि युवा डॉक्टर अस्पताल में भर्ती होने के दिन से ही जातिवादी कातिलों का सामना कर रहे थे और स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि उन्होंने प्रशासन से भी हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया था।

आबिदा तडवी द्वारा लगाए गए आरोपों पर गौर करने के लिए अस्पताल ने एक आंतरिक जांच समिति का गठन किया था कि पायल को उसकी जाति के लिए तीन महिला वरिष्ठों द्वारा परेशान किया जा रहा था और रैगिंग का शिकार भी हुई थी

जातिवादी मानसिकता का अंत कब ?

समाज में व्याप्त जातिवादी मानसिकता का अंत न जाने कब होगा। जाती के आधार पर कोई ऊँचा है कोई निचा है। ये बचपन से सीखा दी जाती है यही कारण है हॉरर किलिंग का भी।
अभी हाल में ही एक वीडियो काफी वायरल हुआ था जिसमे एक युवा लड़की एक जाती विशेष पर अभद्र टिपण्णी करती नजर आयी थी। पहले आप ये वीडियो देखें
युवा लोगों में ऐसे मानसिकता का  अत्यंत चिंता का विषय है। अब समय आ गया है सबको सामान मानकर उचित सम्मान देने का।

ये 21वीं सदी का भारत है, जहाँ एक डॉक्टर को सिर्फ इसलिए ताने सुनने को मिलते है क्योंकि वह आदिवासी समाज से आती है। इतना सवेंंदनहीन समाज क्यों हैै अब तक।

सडकों इमारतों का विकास बहुत हुआ  है भारत मेंं,पर मानवता का विकास नहीं हो पा रहा है ।

मनुष्य को केवल मनुष्य क्यों नहीं माना जा सकता??

क्यों उसको जात-पात में बांटा जा चुका है?

शायद इसलिए की बाँट कर राज करना असान हो जाता है।

हमें आने वाली पीढ़ियों को इस जातिवाद के जहर से बचाने की जरुरत है। ताकि भारतीय समाज और संस्कृति जो अपने आप में बहुत महान है उसके माथे से जातिवाद का कलंक हट सके।