INDIAN ECONOMY CURRENT SITUATION

INDIAN ECONOMY CURRENT SITUATION

Indian economy structure

Indian economy एक mixed economy है अर्थात Indian economy में कुछ प्राइवेट sector व कुछ government sector है। भारतीय अर्थव्यस्था विकासशील अर्थव्यवस्था है,पिछले कुछ वर्षों से सबसे तेज बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था भी रही है।

जीडीपी की दृष्टि से विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गयी है।

ASSOCHAM और थॉट आर्बिट्रेज रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन के अनुसार, 2020 तक जनसंख्या वृद्धि की दर, श्रम शक्ति की भागीदारी और उच्च शिक्षा नामांकन के आधार पर भारत की श्रम शक्ति 160-170 मिलियन को छूने की उम्मीद है।

NSSO के ताजा आंकड़ों के अनुसार बेरोज़गारी दर 6. 1 है जो पीछे 45 सालों में सबसे अधिक है।

भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, 15 मार्च, 2019 तक सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 405.64 बिलियन अमेरिकी डॉलर था।

और क्रय शक्ति समता (पीपीपी) द्वारा तीसरा सबसे बड़ा है। देश 2018 तक $ 7,783 के साथ प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद में 139 वें स्थान पर और प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (पीपीपी) में 122 वें स्थान पर है। 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद, भारत ने सालाना 6-7% औसत विकास दर हासिल की। 2017 के अपवाद के साथ 2014 के बाद से, भारत की अर्थव्यवस्था चीन से आगे निकलकर दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था रही है।

भारतीय अर्थव्यवस्था का दीर्घकालिक विकास परिप्रेक्ष्य इसकी युवा आबादी, अंग्रेजी दक्षता, इसी कम निर्भरता अनुपात, स्वस्थ बचत और निवेश दरों और वैश्विक अर्थव्यवस्था में बढ़ते एकीकरण के कारण सकारात्मक है। भारत पहले विश्व बैंक के विकास के दृष्टिकोण में सबसे ऊपर है। वित्तीय वर्ष 2015-16 में समय, जिसके दौरान अर्थव्यवस्था 7.6% बढ़ी।
पिछले सुधारों के बावजूद, आर्थिक विकास अभी भी नौकरशाही, खराब बुनियादी ढांचे और अनम्य श्रम कानूनों (विशेष रूप से एक व्यापार मंदी में श्रमिकों को बंद करने की अक्षमता) से काफी धीमा है।

भारत में 2001 के बाद से 9% से अधिक वार्षिक विकास दर के साथ दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ते सेवा क्षेत्रों में से एक है, जिसने 2012–13 में सकल घरेलू उत्पाद का 57% योगदान दिया। भारत आईटी सेवाओं, बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO) का एक प्रमुख निर्यातक बन गया है ) वित्त वर्ष 2017 में $ 154 बिलियन राजस्व के साथ सेवाएं, और सॉफ्टवेयर सेवाएं। आईटी उद्योग भारत में सबसे बड़ा निजी क्षेत्र का नियोक्ता बना हुआ है। भारत 2018-19 में 3,100 से अधिक प्रौद्योगिकी स्टार्ट-अप के साथ दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्टार्ट-अप हब है। [45] भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग 2013-14 में 21.48 मिलियन वाहनों (ज्यादातर दो और तीन-पहिया) के वार्षिक उत्पादन के साथ दुनिया में सबसे बड़ा है। भारत में 2015 में खुदरा बाजार में $ 600 बिलियन का मूल्य था और दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते ई-कॉमर्स बाजारों में से एक था।

भारत की वर्तमान आर्थिक स्थिति

आर्थिक परिदृश्य में सुधार के साथ, अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न निवेश हुए हैं। भारत में एम एंड ए गतिविधि 2018 में रिकॉर्ड यूएस $ 129.4 बिलियन तक पहुंच गई जबकि निजी इक्विटी (पीई) और उद्यम पूंजी (वीसी) निवेश 20.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंच गया। भारतीय अर्थव्यवस्था में हाल के कुछ महत्वपूर्ण घटनाक्रम इस प्रकार हैं:

2018-19 (फरवरी 2019 तक) के दौरान, भारत से माल का निर्यात सालाना आधार पर 8.85 प्रतिशत बढ़कर US $ 298.47 बिलियन हो गया है, जबकि सेवाओं का निर्यात सालाना आधार पर 8.54 प्रतिशत बढ़कर US $ 185.59 बिलियन हो गया है।
निक्केई इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) फरवरी 2019 में 14 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया और 54.3 पर आ गया।
2018-19 के लिए शुद्ध प्रत्यक्ष कर संग्रह 16 मार्च, 2019 तक 10 ट्रिलियन (यूएस $ 144.57 बिलियन) को पार कर गया था, जबकि माल और सेवा कर (जीएसटी) संग्रह फरवरी 2019 तक 10.70 ट्रिलियन (यूएस $ 154.69 बिलियन) था।
भारत में इनिशियल पब्लिक ऑफर (IPO) के माध्यम से आय 2018-19 में US $ 5.5 बिलियन और Q1 2018-19 में US $ 0.9 बिलियन तक पहुँच गई।
अप्रैल 2000 और दिसंबर 2018 के बीच सेवाओं, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर, दूरसंचार, निर्माण, व्यापार और ऑटोमोबाइल से अधिकतम योगदान के साथ भारत का विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) इक्विटी प्रवाह यूएस $ 409.15 बिलियन तक पहुंच गया।
भारत का औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP) 2018-19 (जनवरी 2019 तक) में सालाना आधार पर 4.4 प्रतिशत बढ़ा।
फरवरी 2019 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) मुद्रास्फीति 2.57 प्रतिशत थी।
देश में नेट रोजगार सृजन जनवरी 2019 में 17 महीने के उच्च स्तर पर पहुंच गया।

परन्तु भारत अब भी कृषि प्रधान देश है।

भारत मुख्य रूप से आज भी कृषि कार्यों पर ही निर्भर है। छोटे व् मझले उधोग ही भारत की अर्थव्यवस्था की रीड है।
कृषि भारत की अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और वर्तमान में यह है
दुनिया में शीर्ष दो कृषि उत्पादकों के बीच। यह सेक्टर प्रदान करता है
भारत में उपलब्ध नौकरियों की कुल संख्या का लगभग 52 प्रतिशत
और सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 18.1 प्रतिशत का योगदान देता है। कृषि है
में नियोजित वर्ग के लगभग दो-तिहाई के लिए रहने का केवल साधन
इंडिया। वित्तीय वर्ष 2006-07 के आर्थिक आंकड़ों के अनुसार,
कृषि ने भारत की जीडीपी का 18 प्रतिशत हासिल कर लिया है। कृषि
भारत के क्षेत्र ने भारत के भौगोलिक क्षेत्र के लगभग 43 पर कब्जा कर लिया है

70 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण परिवार कृषि पर निर्भर हैं। कृषि भारतीय का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है
अर्थव्यवस्था कुल जीडीपी में लगभग 17% का योगदान करती है और रोजगार प्रदान करती है
60% से अधिक जनसंख्या। भारतीय कृषि ने प्रभावशाली वृद्धि दर्ज की है
पिछले कुछ दशकों से। खाद्यान्न उत्पादन 51 मिलियन टन से बढ़ा है
(MT) 1950-51 से 250MT में 2011-12 के दौरान सबसे अधिक स्वतंत्रता के बाद।

इंडियन इकॉनमी करंट सिचुएशन में विरोधाभास

भारतीय economy में एक गहरा विरोधाभास देखा जा रहा है। नवीनतम सरकारी आंकड़ों के अनुसार भारत की ग्रोथ रेट 5 . 8 है। जो की उम्मीद से काम है और अगर इसकी तुलना अपने ही पिछले 15 वर्षो के प्रदर्शन से करेंगे तो पाएंगे की यह आंकड़ें काफी कमजोर हैं ,लेकिन वैश्विक परिद्र्श्य में तुलनात्मक दृष्टि से इसे प्रशंसनीय कहा जायेगा। बहरहाल ,कई अन्य महत्पूर्ण सूचकांकों पर नजर डालें तो Indian economy की current situation सिरे से निराशाजनक लगती है।
फरवरी 2019 में आये आंकड़े बताते है कि core sector में केवल 2 .1 % वृद्धि हुई है और औधोगिक उतपादन मात्र 0.1 % ऊपर गया है
भारत की निर्यात वृद्धि पिछले पांच वर्षों में शुन्य ही रही है,जो 1991 के बाद से शायद ही कभी हुआ हो।
भारत की बचत और निवेश की दरें वर्ष 2003 में 30 % की सीमा पार करने के बाद वर्ष 2008 में 35 % तक गयी ,जिसमें भारत पूर्वी एशिया की fastest growing economy जैसा लगने लगा था। लेकिन अभी ये 30 % से निचे चली गयी है।

नौकरियों की किल्लत

हमारा कृषि क्षेत्र भी लड़खड़ा रहा है,लेकिन भारत पर नजर रखने वालों के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय देश में नौकरियों की स्थिति है।
इस बारे में आधिकारिक आंकड़े जारी करने पर रोक लगा दी गई है,लेकिन अजीम प्रेमजी
university और CENTER FOR MONITORING THE INDIAN ECONOMY के विस्तृत अध्ययन तथा बिच बिच में सरकारी नौकरियों के लिए उमड़ने वाली आवेदनकर्ताओं की प्रचंड तादाद से स्पष्ट है कि हालत बहुत ख़राब है। अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर click करें।
https://indianeconomycurrentsituation.com/2019/03/23/current-situation-of-unemployment-in-india/

अब सवाल उठता है भारत की शानदार ग्रोथ और इन आंकड़ों को एक साथ कैसे देखा जाए ??

खता बही के ढंग से सोचें तो इस विरोधाभाष की व्याख्या बढ़ती असमानता के जरिये की जा सकती है। देश की आर्थिक वृद्धि चोटी के अमीरो के इर्द गिर्द केंद्रित है ,तभी 9 सबसे अमीर लोगों के पास की सम्पति और 50 % सबसे गरीब जनसँख्या की सम्पति के बराबर है।

जबकि समाज का व्यापक हिस्सा -कामगार तबके ,किसान ,छोटे व्यपारी बड़ी मुश्किल से इंच इंच आगे बढ़ पा रहें हैं। ऐसा कैसे हुआ और इससे उबरने लिए भारत क्या करे??

यहाँ ये मानना जरुरी है कि भारत में कई अच्छी नीतिगत पहलकदमियां ली गई जैसे GST लागू करना ,मुद्रा लोन etc . वहीँ 2016 की नोटेबंदी जैसी कुछ गलतियां भी हुई।

INDIAN ECONOMY IN FUTURE SCENARIO

संसार भर के विशेषज्ञों में अब इस बात को लेकर सहमति बन गई है की नोट बंदी एक भारी भूल थी।
इसने छोटे व्यपारियों ,मजदूरों ,असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों ,किसानों की कमर ही तोड़ दी तथा इसका बहुत ही नकरात्मक प्रभाव डाला ,जबकि आमिर तबका तो नोटेबंदी के प्रभाव से अछूता ही रहा।

दिलचस्प बात यह है कि 2016 -17 के आर्थिक सर्वे में वित्त मत्रांलय ने 1982 के बाद से “अचानक नोटबंदी “करने वाले जिन देशों के नाम हैं – उत्तरी कोरिया ,वेनेजुएला ‘म्यांमार ,इराक ,रूस ,घाना ,ब्राजील और साइप्रस।

यह सूचि स्वयं नोटबंदी की विफलता की व्याख्या करती हुई दिखती है।

पॉलिसी बनाने में गलतियां हो जाती है। इन गलतियों को समय से स्वीकार करके इन्हे दुरुस्त करना प्रोफेशनल होने की निशानी है इससे देश में भरोसा कायम होता है।

कुशलता की कमी कई छोटी पहलकदमियों में भी दिखती रही हैं। जैसे नई आरक्षण निति को लें ,जिसके तहत ‘आर्थिक रूप से कमजोर तबके ‘ को सरकारी नौकरियों में दस फीसदी आरक्षण मिलना है। इसका दायरा कुछ इस तरह तैयार किया गया है की देश की सबसे आमिर 5 % आबादी को छोड़ कर सभी आ जाते हैं।
अर्थात जिन लोगों के लिए ये आरक्षण लागू किया गया है। संभवतः उन्हें इसका लाभ न मिल पायें।

व्यापार एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ भारत को स्वाभाविक बढ़त हासिल है। चीन में बढ़ती मजदूरी को देखते हुए हमारे लिए निर्यात बढ़ाना खास मुश्किल नहीं होना चाहिए था। इससे रोजगार पैदा होते तथा खेती पर भी इसका सकरात्मक असर होता।

लेकिन निर्यात में बढ़ोतरी केवल श्रम सस्ता होने भर से नहीं हो जाती। इसके लिए सुविचारित योजनाओं जैसे विनिमय दरों के प्रबंधन की भी आवशयकता होती है। संपन्न देशों की तरह ही चलायमान विनिमय दर [FLOATING EXCHANGE RATE SYSTEM ] को लेकर प्रतिबद्ध है। लेकिन फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट का मतलब ये नहीं होता की कोई हस्तक्षेप ही न किया जाये। इस बारे में काफी रिसर्च उपलब्ध है,जिसका उचित इस्तेमाल करना चाहिए।

कुछ कार्य किये गए हैं जैसे नौकरशाहों से जुड़े खर्च में कटौती। वर्ल्ड बैंक के ईज ऑफ़ डूइंग बिज़नेस इंडेक्स के मुताबिक भारत 189 देशों में 130 वें स्थान से 2018 में 77 वें नंबर पर आ गया।

इससे रोजगार और निर्यात बढ़ाने में खासी मदद मिलनी चाहिए थी।

मगर पीछे मुड़कर देंखें तो साफ हो जाता है वास्तव में हुआ क्या।
नौकरशाही पर खर्च में व्यापक कटौती करने के बजाय खास तौर पर उन 10 मदों में ही खर्च कम किये गए जिन्हे आधार बनाकर विश्व बैंक किसी देश की नौकरशाही पर होने वालें खर्चों का आंकलन करती है।

इस तरह की चुनिंदा छेड़छाड़ ने वर्ल्ड बैंक से वाह वाही तो दिला दी पर वास्तव में हासिल कुछ नहीं हुआ।

CONCLUSION

आखिर में यही कहना चाहूंगा कि आर्थिक नीतियों से जुडी अधिकतर गड़बड़ियां थोड़े या इससे कुछ ज़्यादा समय के लिए मुश्किलें पैदा करती हैं।
भारत के लिए दीर्घकालीन चिंता की बात ये है की यंहा कुछ खास समूह लोगों कों बाँटने का काम कर रहें है तथा बाँटने वाली बांटे प्रचलित और प्रचारित की जा रही है विशेषतः सोशल मीडिया पर।
भारत में विभिन्न जातियों के हिन्दू ही नहीं ,ईसाई ,यहूदी ,मुस्लिम,पारसी,सिख,बोध,आदि भी रहते हैं।
सवर्ण हिन्दुओं और बाकी समुदायों के बीच दरार डालने की यह कोशिश पुरे देश का मनोबल तोड़ सकती है।
और विकास को दीर्घकालिन नुकसान पहुँचा सकती हैं।

4 thoughts on “INDIAN ECONOMY CURRENT SITUATION

  • April 27, 2019 at 4:22 pm
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    there is huge difference in central and state govt modi suceeded as cheif MINISTER BECAUSE theresuffcient govt money in market from 2001 to 2011 it average more than 80% of gdp . govt money has two components cash in circulation and govt debt . what modi is doing is withdrawing govt money from market now govt MONEYhas fallen to as low as 56% of gdp hence india is headed for massive failure. rbi has alrready done record open market operation to tune of 3lakh crore. which means savings of private sector have reducd by three lac crore plus there is lost of 21000crore worth govt money every year as saving is used to service exixsting loans as there is liquidity problem. reducing FISCAL DEFECIT IS GOOD FOR STATE GOVT BUT BAD FOR CENTRAL GOVT. HENCE MODI IS FURTHER DEEPING THE PITS AND INCRESING THE SIN. . MAIN FUNCTION OF CENTRAL GOVT IS TO INCREASE GOVT MONEY SUPPLY BY DEFECIT SPENDING BUT MODI IS DOING OPPOSITE HENCE I LOVINGLY CALL HIM CHEIF MINISTER OF INDIA.

  • May 4, 2019 at 5:54 am
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    Real situation of Indian economy thanks for this infotmainfo blog

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