- हिन्दी सहित्य

पहचान

क्या मैंने खुद को पहचाना है?

माना मुझे कोई जानता नहीं,
बात तो करता है पर पहचानता नहीं,

मुद्दा यह उठता है कि
क्या खुद को मैंने पहचाना है,

जीतनी उम्मीद औरों से की
क्या खुद को मैंने जाना है,

आईना युही इतराता है,
बात बात पर बहलाता है,

मुझसे यह छुपाता है,
कि मैंने खुद को भी नहीं पहचाना है ।

अनुभूतियों की भिन्नता

पल पल अनुभूति बदलती है
कभी प्रेम में सराबोर
तो कभी विरह में अश्रुपूरित
कभी पुलकित
तो कभी छिन्न भिन्न

अजीब सी राहों की
पल पल बदलती अनुभूति
किस तरह से गुजरती है
अनुभूति से अनुभूति।।

अक्सर ऐसा होता है।

गलीचे बिछे हैं कांटो के मेरी राह में,
कैसे चल दूँ,
कि हिम्मत जवाब देती है,

जोड़ कर सारी मजबूरियां
थोड़ी सी हिम्मत खिसकती है,
कि चल, चल दें ।

एक क़दम बढ़ाते हैं,
थोड़े से लहू लुहान हो जाते हैं,
ग़लीचे बिछे हैं काँटो के मेरी राह में,
कैसे चल दूँ।

सोच मे रहे कुछ पल के लिए
कि तूफ़ान उठा का हिम्मत का,
आखिर मजबूरी का पलड़ा भारी था

चलना तो हर हाल में था
तो कहा, चल चल दें,
होने दे घायल पाव ही तो हैं,

लगा लेंगे मरहम
मुक़ाम पर जा कर
आखिर घाव ही तो है।

जब तक जीवन है
चलना ही चलना है,
अक्सर यूँही होता है
दिल गिर गिर कर संभालता है।।

padmajarathoreraghav

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